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| पिछले कुछ दशकों में भारत एक के बाद एक आई आपदाओं से इस कदर आहत और क्षत-विक्षत हुआ है कि उसे संभलने का अवसर ही नहीं मिल सक |
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अग्र लेख
जीवन, संपति और संरचनाओं का सरंक्षण
राष्टिय आपदा प्रबंधन प्रधिकरण (एनङीएमए) के उपाध्यक्ष के साथ योजना की बातचीत के अंश
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मुद्रास्फीति : पुनर्विचार मांगता प्रश्न कमल नयन काबरा |
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अन्य सभी क्षेत्रों की तरह ही अर्थ...
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नितियों को मुद्रास्फीति की चुनौती शशांक भिङे |
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मुद्रास्फीति की ऊंची दर उपभोक्ताओं...
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भारत में मुद्रास्फीति के प्रकरण मानस भट्टाचार्य |
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भारत में परंपरा से मुद्रास्फीति ...
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मुद्रास्फीति और अर्थव्यवस्था की स्थिति के.आर.सुदामन |
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मुद्रास्फीति ऐसी स्थिति है जिससे...
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मुद्रास्फीति : मिथक, वास्तविकता एवं नीतिगत एजेंडा
वी. षण्णमुखम देबज्योति डे |
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भारत में तेज़ी से बढ़ रही महंगाई, वैसे ...
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समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन |
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पिछले वर्षो के दौरान एशियाई उपमहादीप में हर प्रकार की प्राकृतिक आपदाएं आती रही हैं| अनेक अध्ययनों, अनुसंधानों और आंकडो से पता चलता है कि पिछले 15 वर्षो की अवधी में एशियाई देशों को अनेक आपदाओं का सामना करना पडा| आंकडो के हिसाब से देखा जाए तो यहां के हर 10 लाख लोगों पीछे (1991 से 2005 के बीच) 57,342 (यूएनआई एसडीआर) लोगों को ये विपत्तियां झेलनी पडीं| जिन आपदाओं का व्यापक असर रहा, उनमें जल और मौसम से संबंधित, भौगोलिक एवं जैविक किस्म की विपत्तियां शामिल हैं| इनके कारण 577.44 अरब अमरीकी डाँलर के बराबर आर्थिक हानि हुई| जो देश इनसे प्रभावित हुए उनमें विकसित और विकासशील दोनों तरह के राष्ट्र आते हैं| इन देशों में आपदा पीडित होने की संभावना और खतरा अधिक है| इनमें कई देश ऐसे हैं जहां के लोग भोजन, वस्त्र और मकान का भी मुश्किल से जुगाड कर पाते हैं| इनके आपदाग्रस्त होने की संभावना भौगोलिक- राजनीतिक कारणौं से भी अधिक है|
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