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ज्ञानवान समाज के निर्माण की जरूरत |
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भारत जैसे-जैसे विकास और प्रगति के रोमांचकारी नये भविष्य की ओर बढ रहा है, सतत विकास का एजंङा गढने में ज्ञान की भूमिका महत्वपूर्ण होती जाएगी |...
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विश्वविधालय और समाज के बीच संवाद आवश्यक |
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यदि आप एक छात्र हैं, शिक्षक हैं या शोधार्थी हैं और वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की खामियों से नाखुश हैं, आपको कालेज और विश्वविधालय में नियम-कानूनों में बाधंकर...
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श्रम बाजार के अनुरूप उच्च शिक्षा |
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पहले से चले आ रहे इस अफलातूनी विचार से आज भी अनेक लोग कायल हैं कि उच्च शिक्षा का उद्देश्य है व्यक्ति को समर्थ बनाना, लेकिन अब व्यावहारिक बुध्दि वाले...
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अनिवार्य शिक्षा कानून और अग्रणी प्राथमिक शिक्षा योजनाएं |
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छियासिवें संविधान अधिनियम, 2002 ने संविधान के भाग-3 में एक नया अनुच्छेद 21-क समाविष्ट किया जिसमें 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान...
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शिक्षा का अधिकार अधिनियम |
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संसद में 4 अगस्त, 2009 को बच्चों का नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित हो गया है | इसके साथ ही देश के प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का मौलिक अधिकार प्राप्त हो गया है |...
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संपादकीय
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समावेश शब्द न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में, नीति निर्माताओं के लिए विकास का मंत्र बन चुका है | समावेशी विकास के लिए, सभी के लिए शिक्षा से भी अधिक महत्वपूर्ण योगदान भला किस का हो सकता है | उत्तम और सम्रग शिक्षा न केवल लोगों को सशक्त बनाती है, बल्कि व्यक्तिगत और सामूहिक हकों के साथ - साथ सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में भाग लेने और उत्पादक रोजगार के लिए अवसर पैदा करती है |
समुचे विश्व समुदाय ने सर्व शिक्षा को सहस्राब्दी विकास लक्ष्य के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में स्वीकार किया है | जी-आठ देशों को कहना है कि वर्तमान आर्थिक संकट से पार पाने के लिए इस क्षेत्र में निवेश नितांत आवश्यक है| इधर, भारत भी देश में शिक्षा के पुनर्गठन और पुनरूध्दार के अपने एजेंडा को आगे बढाने में सक्रिय रूप से लागा हुआ है | निश्चित रूप से, ऐसा बहुत कुछ है जिसको पुनर्गठित करने और नये सिरे से संगठित करने की आवश्यकता है |
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शिक्षा में संशोधन नहीं परिवर्तन चाहिए |

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शिक्षा के दो पक्ष होते हैं | एक आंतरिक, जिसमें पाठ्यक्रम आता है और दूसरा बाहृय, जिसमें शिक्षण पध्दति निर्धारित होती है | क्या पढना है, इस पर निर्भर करता है कि उसे कैसे पढाया जाए? इसलिए जिस विधि से विज्ञान पढाया जाता है, उसी विधि से कला नहीं पढाई जा सकती, ठीक वैसे ही जैसे जिस तरीके से तर्क किया जाता है उसी तरीके से प्रेम नहीं किया जा सकता | विषय के हिसाब से विधि बदल जाती है | इसलिए शिक्षा पर विचार करते वक्त सबसे पहले इस पर विचार किया जाना जरूरी है कि पढाया क्या जाए? यानी पाठ्यक्रम क्या हो?...
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