अंक: August 2010
 
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संपादकीय  
 
 
  मुद्रास्फीति : पुनर्विचार मांगता प्रश्न
कमल नयन काबरा
  अन्य सभी क्षेत्रों की तरह ही अर्थ...
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शशांक भिङे
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मानस भट्टाचार्य
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  मुद्रास्फीति और अर्थव्यवस्था की स्थिति
के.आर.सुदामन
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वी. षण्णमुखम देबज्योति डे
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अग्र लेख

मुद्रास्फीति : पुनर्विचार मांगता प्रश्न
कमल नयन काबरा

अन्य सभी क्षेत्रों की तरह ही .....

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उदारीकरण का युग शुरू होने के पूर्व भारत में मुद्रास्फीति के दौर कई बार आए| प्राय: सभी प्रकार की वस्तुओं के अभाव के साथ-साथ विस्तारवादी मौद्रिक नीति के मिले-जुले प्रभाव को यदि सरल शब्दों में व्यक्त किया जाए तो कहा जा सकता है कि ढेर सारा पैसा थोड़े से सामान के पीछे पड़ा हुआ है| नब्बे के दशक के पूवार्द्ध में आर्थिक सुधारों की शुरूआत के फलस्वरूप त्वरित और तीव्र विकास के युग में भारत के प्रवेश करने के साथ ही सौभाग्य से उस दुखद अध्याय की इति हो गई|

नियंत्रणकारी प्रशासकीय उपायों में शिथिलता का भी इसमें विशेष योगदान रहा| इसके बाद भी मुद्रास्फीति के दौर आते रहे हैं, परंतु इनके पीछे कोई विशेष कारण रहा होता है और नीतिगत परिवर्तनों का असर इन पर शीघ्र पड़ने लगता है| परंतु वर्ष 2008-09 के प्रारंभ से ही मुद्रास्फीति का जो दौर इस बार शुरू हुआ है,वह थमने का नाम ही नहीं ले रहा| प्रारंभिक चरण में इसका कारण था, वैश्विक स्तर पर वस्तुओं और जिन्सों के मूल्यों में अचानक आई तेजी, जो भारतीय अर्थव्यवस्था में भी दबे पांव घुस आई थी| लगभग इसी समय जमीन-जायदाद की कीमतों में भी तेजी आनी शुरू हो गई जिसके कारण मूल्य नियंत्रण के सारे प्रयास निष्प्रभावी और जटिल होते गए| भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में वृद्धि कर कई बार इसे बार इसे नियंत्रित करने का प्रयास किया परंतु वैश्विक अर्थव्यवस्था में छाई मंदी के कारण उनका कोई विशेष प्रभाव नहीं हुआ|

मुद्रास्फीति और गिरती विकास दर का पीछा करते हुए केंद्रीय बैंक ने वर्ष 2008-09 के उतरार्द्ध में गिरती विकास दर को दर थामने पर जोर देना शुरू किया| यह चरण भी वर्ष 2009 के मई-जून महीनों में समाप्त हो गया| अब मुद्रास्फीति में जो वृद्धि हो रही थी, वह जिन्सों की महंगाई के कारण हो रही थी| परंतु इस बार का दबाव घरेलू कारणों से आ रहा था| सरकार को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गांरटी कार्यक्रमों और अन्य सुविचारित कार्यक्रमों के माध्यम से पिछले कुछ वर्षों में ग्रामीण भारत की क्रयशक्ति में अच्छी वृद्धि हुई है| अत: अब तक भूख और गरीबी की यातना सह रहे गांव के लोगों में बेहतर जीवन की अभिलाषा कुलबुलाने लगी है| फलस्वरूप उनके खान-पान के स्तर में कुछ सुधार आया है| उनकी थाली में अब जो भोज्य पदार्थ दिखने लगे हैं उनके बारे में वे पहले सोच भी नहीं सकते थे| शायद यह भी एक कारण हो सकता है कि खाधान्न मुद्रास्फीति कम होने का नाम ही नहीं ले रही है|

 
 
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