अंक: November 2009
 
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संपादकीय  
 
 
  उधम समूहों का विकास
  क्लस्टर सूक्ष्म, लघु, मध्यम और यहां तक कि बड़े उधमों का एक समूह होता है; जिनमें एक ही प्रकार की वस्तुओं (अथवा सेवाओं) का उत्पादन होता है और...
  विपणन की चुनौतियां और अवसर
  प्रत्येक शहर में बड़े-बड़े शाँपिंग माँल खुल रहे हैं| विश्व के कोने-कोने में रिटेल श्रृखंलाएं खुलती जा रही हैं| उभोक्ता खूब खर्च कर रहें हैं| उनकी आमदनी बढ़ रही है और इंटरनेट...
  सवाल मजदूरों के पोषण और स्वास्थ्य रक्षा का
  भूमंडलीकरण के दौर ने चीजों को काफी बदल दिया है| इसने सबसे बड़ा बदलाव आर्थिक कामकाज के पुराने वर्गीकरणों को बेमानी करने और कायदे-कानूनों को दरकिनार करने का किया है|...
  असंगठित क्षेत्र की छतरी
  यह कितनी बड़ी बिडंबना है कि देश के सकल घरेलु उत्पाद में 63 प्रतिशत का योगदान करने वाले मजदूर मौजूदा दौर में जिंदगी की आम ज़रूरतों और सहूलियतों से महरूम हैं|...
  भारत में समावेशी विकास
  समावेशी विकास संप्रग सरकार का मूल मंत्र है| कल्याणकारी सामाजिक परियोजनाओं का अधिकाधिक लाभ लाभार्थियों को मिले इसके लिए केंद्र सरकार ने वित्तीय समावेशन की मुहिम छेड़ रखी है| ...
अग्र लेख

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उधमों का वित्तपोषण मुद्दे एवं चिंतायें

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उधम औधोगीकरण, रोजगार सृजन, निर्यात वृध्दि और क्षेत्रीय संतुलन को बनाए रखने की प्रक्रिया में अपने उल्लेखनीय योगदान के कारण प्राय: सभी अर्थव्वस्थाओं......

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भारत को सबसे तेजी से उभरने वाली अर्थव्यवस्था वाले देशों में प्रमुख स्थान दिलाने में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उधमों (एमएसएमई) की महती भूमिका रही है| देश के विनिर्माण क्षेत्र के उत्पादन का लगभग 45 प्रतिशत और कुल निर्यात का करिब 40 प्रतिशत इसी क्षेत्र में होता है| समावेशी विकास के इस युग में, सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य तो यह है कि एमएसएमई का यह क्षेत्र बड़ी संख्या में लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराता है (अनुमान है कि वर्तमान में क़रीब 4 करोड़ 20 लाख लोग इस क्षेत्र में कार्यरत हैं) और अधिक बेहतर ढंग से संपत्ति के समान वितरण के साथ-साथ सतुंलित क्षेत्रीय विकास के संवर्धन में भी समर्थ है|

एमएसएमई क्षेत्र, पूर्व में लघु उधोग क्षेत्र के रूप में जाना जाता था और इस क्षेत्र को सदा ही सरकार का नीतिगत समर्थन मिलता रहा है| नब्बे के दशक के प्रारंभिक वर्षो में, संरक्षण-केंद्रित व्यवस्था में बदलाव की शुरूआत हुई और मुक्त अर्थव्यवस्था के झंझावातों का मजबूती से सामना करने के इरादे से जीवटता और स्पर्धात्मकता बढ़ाने वाली नीतियों को अपनाया जाने लगा | वर्ष 2006 में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उधम विकास अधिनियम का पारित होना, खादी एवं ग्रामोधोग आयोग अधिनियम में संशोधन, एमएसएमई इकाइयों को प्रोत्साहित करने वाले व्यापक पैकेज़ों की घोषणा, राष्ट्रिय असंगठित क्षेत्र उधम आयोग का गठन, राष्ट्रिय विनिर्माण स्पर्धात्मकता कार्यक्रम, राजीव गांधी उधमी मित्र योजना, एमएसएमई क्लस्टर विकास योजना और इस तरह के अन्य अनेक कार्यक्रमों ने इस क्षेत्र को सुद्र्ढ़ता प्रदान करने के साथ-साथ ऋण, अधोसंरचना, प्रौधोगिकी और विपणन से संबंधित विपणन से संबधित वर्षो पुरानी इसकी समस्याओं के समाधान में भी योगदान किया है | इस पूरी कसरत के दौरान इस क्षेत्र को अधिकाधिक स्पर्धात्मक बनाने और घरेलु एवं विदेशी, दोनों बाजारों में इसकी मौजूदगी बढ़ाने पर पूरा ज़ोर दिया जाता रहा है| इन प्रयासों का फल भी मिला है| एक करोड़ तीस लाख की क्षमता वाला एमएसएमई क्षेत्र न केवल 6,000 से अधिक वस्तुओं का उत्पादन करता है, बल्कि कुल 56 खरब रूपये के आकार वाला क्षेत्र होने का दावा भी करता है| समग्र औधोगिक क्षेत्र से अधिक वृध्दिदर बनाए रखने के साथ-साथ एमएसएमई क्षेत्र, सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) में क़रिब 6 प्रतिशत का योगदान कर रहा है|

 
 
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