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| पिछले कुछ दशकों में भारत एक के बाद एक आई आपदाओं से इस कदर आहत और क्षत-विक्षत हुआ है कि उसे संभलने का अवसर ही नहीं मिल सक |
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अग्र लेख
जीवन, संपति और संरचनाओं का सरंक्षण
राष्टिय आपदा प्रबंधन प्रधिकरण (एनङीएमए) के उपाध्यक्ष के साथ योजना की बातचीत के अंश
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मुद्रास्फीति : पुनर्विचार मांगता प्रश्न कमल नयन काबरा |
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अन्य सभी क्षेत्रों की तरह ही अर्थ...
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नितियों को मुद्रास्फीति की चुनौती शशांक भिङे |
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मुद्रास्फीति की ऊंची दर उपभोक्ताओं...
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भारत में मुद्रास्फीति के प्रकरण मानस भट्टाचार्य |
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भारत में परंपरा से मुद्रास्फीति ...
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मुद्रास्फीति और अर्थव्यवस्था की स्थिति के.आर.सुदामन |
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मुद्रास्फीति ऐसी स्थिति है जिससे...
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मुद्रास्फीति : मिथक, वास्तविकता एवं नीतिगत एजेंडा
वी. षण्णमुखम देबज्योति डे |
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भारत में तेज़ी से बढ़ रही महंगाई, वैसे ...
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आपदा प्रबंधन प्रयासों में आमूल परिवर्तन |
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प्राकृतिक और मानवनिर्मित आपदाएं प्रायः मौत का कारण बनती हैं और आजीविका का हास हौता हैं|
साथ ही संपत्ति, परिसंपत्तियों और आधारभूत संरचना का विनाश होता है|
आपदाओं के कारण असुरक्षित एवं वंचित वर्ग के लोगों के लिये खतरा बढ जाता है और आपदा-प्रभावित तथा आपदा-संभावित समुदायों में सामाजिक-मनोवैज्ञानिक तनाव और सदमा व्याप्त हो जाता है|
बाढ जैसी बारंबार आने वाली आपदाओं से आपदा-संभावित समुदाय संकट से जूझने के सामर्थ्य और शक्ति से हीन हो जाने के कारण विश्वास की कमी के शिकार हो जाते हैं|
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इनके अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो जाता है और बार-बार महीनों तक उनका सामान्य जीवन बुरी तरह प्रभावित होता रहता है|
आपदाओं के अचानक आने से,विशेषकर तब जब विस्थापित लोग अस्थायी राहत शिविरों में शरण लेने के लिए विवश हों, बच्चों, शिशुओं और बुजुर्ग लोगों के प्रति उपेक्षा और अभाव का खतरा और अधिक बढ जाता है|
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