अंक: August 2010
 
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पृष्ठ कथा
पिछले कुछ दशकों में भारत एक के बाद एक आई आपदाओं से इस कदर आहत और क्षत-विक्षत हुआ है कि उसे संभलने का अवसर ही नहीं मिल सक...
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अग्र लेख

जीवन, संपति और संरचनाओं का सरंक्षण

राष्टिय आपदा प्रबंधन प्रधिकरण (एनङीएमए) के उपाध्यक्ष के साथ योजना की बातचीत के अंश .........

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पवन ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की ऊंची उड़ान

जाहिर तौर पर ज्योति को ऊर्जा संरक्षण के लिए चिंता करने की कुछ खास जरूरत नहीं। वह आन्ध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम के पास अर्कू घाटी में एक छोटे गाँव में रहती है। आसपास बहुत से पेड़ हैं। जलावन की लकड़ी इकट्ठा करना मशक्कत का काम भले ही है, लेकिन मुश्किल नहीं क्योंकि अडोस -पड़ोस में खूब पेड़  उगे हुए हैं। लेकिन फिर भी ऐसा लगता है कि इस मामले में उसका ख्याल कुछ और है। उसने ऊर्जा संरक्षण की तिहरी नीति बना ली है। उसका चूल्हा तीन मुंह वाला है जिस पर वह खाना बनाती है। चूल्हे से जो गरमी और धुआं निकलता है उसे इस्तेमाल करने के लिए उसने दो फीट ऊपर बांस की एक खपच्ची बांध रखी है। वह धन के पके पोधों के गुच्छे उस पर रख देती है जिससे वे गरम होकर सुखा जाते हैं और उन्हें पीटने में आसानी होती है। तीसरे स्तर पर ऊर्जा का इस्तेमाल करने की जुगत भी उसने लगा रखी है। उससे ऊपर वह बीजों से भरा बोरा लटका देती है। इससे बीज मामूली-सा गरम हो जाता है जिससे उसमें कीड़े नहीं लगते और बुवाई  के सीजन तक सुरक्षित रहते हैं। जलावन की लकड़ी से मिलने वाली ऊर्जा का तिहरा इस्तेमाल लकड़ी से अधिकतम फायदा उठाने का सबसे बढ़िया तरीक़ा है। यह तरीक़ा मन में किफ़ायत और कुशलता की भावना लाने से काम करता है। ऐसे अनेक तौर -तरीकों की खोज हनी-बी तंत्र के सदस्यों ने देशभर में शोध यात्रा (विभिन्न क्षेत्रों में हर ग्रीष्म ऋतु और शीतकाल में पदयात्राएं करके) के जरिये की हैं। इनका आयोजन सृष्टि (सोसायटी फॉर रिसर्च एंड इनीशिएटिव फॉर ससटेनेबल टेक्नोलॉजीज एंड इंस्टीट्यूशंस), राष्ट्रीय नवाचार फाउंडेशन (एनआईएफ) तथा अन्य सहयोगियों ने मिलकर किया।

 
 
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