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| पिछले कुछ दशकों में भारत एक के बाद एक आई आपदाओं से इस कदर आहत और क्षत-विक्षत हुआ है कि उसे संभलने का अवसर ही नहीं मिल सक... |
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अग्र लेख
जीवन, संपति और संरचनाओं का सरंक्षण
राष्टिय आपदा प्रबंधन प्रधिकरण (एनङीएमए) के उपाध्यक्ष के साथ योजना की बातचीत के अंश
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मुद्रास्फीति : पुनर्विचार मांगता प्रश्न कमल नयन काबरा |
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अन्य सभी क्षेत्रों की तरह ही अर्थ...
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नितियों को मुद्रास्फीति की चुनौती शशांक भिङे |
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मुद्रास्फीति की ऊंची दर उपभोक्ताओं...
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भारत में मुद्रास्फीति के प्रकरण मानस भट्टाचार्य |
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भारत में परंपरा से मुद्रास्फीति ...
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मुद्रास्फीति और अर्थव्यवस्था की स्थिति के.आर.सुदामन |
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मुद्रास्फीति ऐसी स्थिति है जिससे...
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मुद्रास्फीति : मिथक, वास्तविकता एवं नीतिगत एजेंडा
वी. षण्णमुखम देबज्योति डे |
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भारत में तेज़ी से बढ़ रही महंगाई, वैसे ...
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कृषि : विकास की रीढ बनने में बाधा कैसी? |
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''किसानों का स्थान पहला है चाहे वे भूमिहीन मजदूर हों या मेहनत करने वाले जमीन मालिक हों। उनके परिश्रम से ही पृथ्वी फलप्रसू और समृद्व हुई है। मुझे इसमें संदेह नहीं कि यदि हमें लोक तांत्रिक स्वराज्य हासिल होता है- और यदि हमने अपनी स्वतंत्रता अहिंसा से पाई तो जरूर ऐसा ही होगा- तो उसमें किसानों के पास राजनीतिक सत्ता के साथ हर किस्म की सत्ता होनी चाहिए। किसानों को उनकी योग्य स्थिति मिलनी ही चाहिए और देश में उनकी आवाज ही सबसे ऊपर होनी चाहिए।'' - महात्मा गाँधी महात्मा गांधी के ये वाक्य आजादी के पूर्व के हैं। इससे पता चलता है कि स्वतंत्रता संघर्ष के मुख्य नायक की स्वातंत्र्योत्तर भारत की जो कल्पना थी उसमें किसानों का क्या स्थान था। गांधीजी ही नहीं ऐसे दुसरे मनीषियों के कथन या लेखन को देखें तो यह समझते देर नहीं लगेगी कि राष्ट्र निर्माण की इनकी कल्पना में कृषि, किसान और गांव की भूमिका रीढ़ की थी। जाहिर है, उनकी कल्पनाओं के अनुसार यदि भारत निर्माण की नीतियां बनतीं तो इस समय का आर्थिक-सामाजिक परिदृश्य बिल्कुल अलग होता। इसे देश का दुर्भाग्य कहना होगा कि विकास की हमारी नीतियों में कृषि, किसान और गांव धीरे - धीरे हाशिये पर चले गए और उद्योग-व्यापार प्रमुख हो गए। कहने का अर्थ यह नहीं कि स्वतत्रंता के बाद जिनके हाथों देश का नेतृत्व आया उनके मन में गावों के प्रति विद्वेष था या वे कृषि के महत्व को नहीं समझते थे, किंतु भारत की पुनर्रचना की नीतियां बनाने में भूलें अवश्य हुईं। उनका इरादा कृषि को नजरअंदाज करने का नहीं था किंतु विकास का जो ढांचा विकसित हुआ उसका स्वरूप ऐसा था जिसमें धीरे - धीरे कृषि, किसान और गांव को हाशिये पर जाना ही था। यहां तक कि कृषि की आधारभूत संरचना के लिए जो नीतियां बनीं और उनके अनुसार जो ढांचे खड़े हुए उनसे भी कृषि की दुर्दशा हुई।
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