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| पिछले कुछ दशकों में भारत एक के बाद एक आई आपदाओं से इस कदर आहत और क्षत-विक्षत हुआ है कि उसे संभलने का अवसर ही नहीं मिल सक... |
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अग्र लेख
भारतीय अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र का योगदान जी. श्रीनिवासन
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अधिकतम शासनः ई-शासन के माध्यम से जनपहुंच
रंजीत मेहता
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भारत में ई-गवर्नेंस की शुरुआत रक्षा सेवाओं, आर्थिक नियोजन, राष्ट्रीय जनगणना, चुनाव, कर संग्रह, आदि के लिए कम्प्यूटरीकरण पर जोर के साथ 1960 के दशक के अंत में
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किसानों का कल्याणः वर्तमान परिदृश्य
जे पी मिश्र
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कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का विशालतम क्षेत्र है। इस क्षेत्र ने वर्ष 2014-15 में समग्र सकल मूल्य वर्धन में
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योगः आधुनिक जीवनशैली व अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता
ईश्वर वी बासवरेड्डी
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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इलाज में चिकित्सा के प्राचीन प्रणालियों को शामिल करने की जरूरत पर जोर दिया है। डब्ल्यूएचओ ने सु
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योग साधकों का मूल्यांकन एवं प्रमाणन
रवि पी सिंह&bsp; मनीष पांडे
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योग संस्थानों के प्रमाणन की योजना उन मूलभूत नियमों में सामंजस्य बिठाने की दिशा में उठाया कदम है,
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योगः स्वस्थ व तनावमुक्त जीवन का संतुलन
ईश्वर एन आचार&bsp; राजीव रस्तोगी
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आज की व्यस्त जीवनशैली में अपने स्वास्थ्य का ख्याल रख पाना एक जटिल कार्य हो गया है लेकिन
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कृषि : विकास की रीढ बनने में बाधा कैसी? |
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''किसानों का स्थान पहला है चाहे वे भूमिहीन मजदूर हों या मेहनत करने वाले जमीन मालिक हों। उनके परिश्रम से ही पृथ्वी फलप्रसू और समृद्व हुई है। मुझे इसमें संदेह नहीं कि यदि हमें लोक तांत्रिक स्वराज्य हासिल होता है- और यदि हमने अपनी स्वतंत्रता अहिंसा से पाई तो जरूर ऐसा ही होगा- तो उसमें किसानों के पास राजनीतिक सत्ता के साथ हर किस्म की सत्ता होनी चाहिए। किसानों को उनकी योग्य स्थिति मिलनी ही चाहिए और देश में उनकी आवाज ही सबसे ऊपर होनी चाहिए।'' - महात्मा गाँधी महात्मा गांधी के ये वाक्य आजादी के पूर्व के हैं। इससे पता चलता है कि स्वतंत्रता संघर्ष के मुख्य नायक की स्वातंत्र्योत्तर भारत की जो कल्पना थी उसमें किसानों का क्या स्थान था। गांधीजी ही नहीं ऐसे दुसरे मनीषियों के कथन या लेखन को देखें तो यह समझते देर नहीं लगेगी कि राष्ट्र निर्माण की इनकी कल्पना में कृषि, किसान और गांव की भूमिका रीढ़ की थी। जाहिर है, उनकी कल्पनाओं के अनुसार यदि भारत निर्माण की नीतियां बनतीं तो इस समय का आर्थिक-सामाजिक परिदृश्य बिल्कुल अलग होता। इसे देश का दुर्भाग्य कहना होगा कि विकास की हमारी नीतियों में कृषि, किसान और गांव धीरे - धीरे हाशिये पर चले गए और उद्योग-व्यापार प्रमुख हो गए। कहने का अर्थ यह नहीं कि स्वतत्रंता के बाद जिनके हाथों देश का नेतृत्व आया उनके मन में गावों के प्रति विद्वेष था या वे कृषि के महत्व को नहीं समझते थे, किंतु भारत की पुनर्रचना की नीतियां बनाने में भूलें अवश्य हुईं। उनका इरादा कृषि को नजरअंदाज करने का नहीं था किंतु विकास का जो ढांचा विकसित हुआ उसका स्वरूप ऐसा था जिसमें धीरे - धीरे कृषि, किसान और गांव को हाशिये पर जाना ही था। यहां तक कि कृषि की आधारभूत संरचना के लिए जो नीतियां बनीं और उनके अनुसार जो ढांचे खड़े हुए उनसे भी कृषि की दुर्दशा हुई।
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झरोखा जम्मू कश्मीर का : कश्मीर में रोमांचकारी पर्यटन |
जम्मू-कश्मीर विविधताओं और बहुलताओं का घर है| फुर्सत के पल गुजारने के अनेक तरकीबें यहाँ हर आयु वर्ग के लोगों के लिए बेशुमार है| इसलिए अगर आप ऐडवेंचर टूरिस्म या स्पोर्ट अथवा रोमांचकारी पर्यटन में रूचि रखते हैं तो जम्मू-कश्मीर के हर इलाके में आपके लिए कुछ न कुछ है.
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