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| पिछले कुछ दशकों में भारत एक के बाद एक आई आपदाओं से इस कदर आहत और क्षत-विक्षत हुआ है कि उसे संभलने का अवसर ही नहीं मिल सक... |
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अग्र लेख
जीवन, संपति और संरचनाओं का सरंक्षण
राष्टिय आपदा प्रबंधन प्रधिकरण (एनङीएमए) के उपाध्यक्ष के साथ योजना की बातचीत के अंश
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मुद्रास्फीति : पुनर्विचार मांगता प्रश्न कमल नयन काबरा |
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अन्य सभी क्षेत्रों की तरह ही अर्थ...
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नितियों को मुद्रास्फीति की चुनौती शशांक भिङे |
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मुद्रास्फीति की ऊंची दर उपभोक्ताओं...
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भारत में मुद्रास्फीति के प्रकरण मानस भट्टाचार्य |
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भारत में परंपरा से मुद्रास्फीति ...
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मुद्रास्फीति और अर्थव्यवस्था की स्थिति के.आर.सुदामन |
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मुद्रास्फीति ऐसी स्थिति है जिससे...
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मुद्रास्फीति : मिथक, वास्तविकता एवं नीतिगत एजेंडा
वी. षण्णमुखम देबज्योति डे |
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भारत में तेज़ी से बढ़ रही महंगाई, वैसे ...
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उपभोक्ता अपना अधिकार जानें |
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एक स्वतत्रं अर्थव्यवस्था में देश का प्रत्येक नागरिक उपभोक्ता होता है, चाहे वह एक छोटा बच्चा ही क्यों न हो यहां तक कि एक वस्तु का उत्पादक, वितरक तथा विक्रेता भी किसी न किसी प्रकार से उपभोक्ता की श्रेणी में आता है। व्यवसाय में उपभोक्ता का स्थान सर्वोपरि होता है। अर्थशास्त्र के उपभोक्ता 'सार्वभौमिकता' व 'ग्राहक जो चाहे उसे मिले' जैसे सिद्धांत के अनुसार, उपभोक्ता व्यवसाय का राजा होता है और उसी की इच्छानुसार सारे उत्पादों एवं सेवाओं का उत्पादन एवं विपणन होता है। ये सिद्धांत व्यवसाय का मार्गदर्शन तो करते हैं, किंतु ये मात्र सेद्वान्तिक पक्ष हैं। व्यवहार में यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि अभी भी विकसित अर्थव्यवस्थाओं तक में उपभोक्ता का वह स्थान नहीं है, जो उसे प्राप्त होना चाहिए। भारतीय अर्थव्यवस्थाओं में ग्राहक की स्थिति तो और भी शोचनीय है। उपभोक्ता सदेव व्यवसायियों द्वारा अनुचित लाभ कमाने के उद्देश्य से ठगे जाते रहे हैं। समाज में बहुधा एसे लोग मिल जाते हैं जो यह शिकायत करते हैं कि उन्हें अमुक व्यक्ति ने ठग लिया या अमुक व्यक्ति की धोखाधडी के वे शिकार हो गए, क्रय किया गया माल बतलाए गए गुणों के बिलकुल विपरीत है, लेकिन अब क्या हो सकता है शायद यही हमारी किस्मत में लिखा था। लोग ठगे जाते रहते हैं और उसका रोना रोते रहते हैं। यह स्थिति क्यों आती है और समाज में धोखाधडी और ठगी क्यों चलती रहती है? इसका एकमात्र कारण यही है कि उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों की जानकारी नहीं होती और उनमें शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने की जागरुकता का अभाव होता है। |
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