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| पिछले कुछ दशकों में भारत एक के बाद एक आई आपदाओं से इस कदर आहत और क्षत-विक्षत हुआ है कि उसे संभलने का अवसर ही नहीं मिल सक... |
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अग्र लेख
जीवन, संपति और संरचनाओं का सरंक्षण
राष्टिय आपदा प्रबंधन प्रधिकरण (एनङीएमए) के उपाध्यक्ष के साथ योजना की बातचीत के अंश
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मुद्रास्फीति : पुनर्विचार मांगता प्रश्न कमल नयन काबरा |
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अन्य सभी क्षेत्रों की तरह ही अर्थ...
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नितियों को मुद्रास्फीति की चुनौती शशांक भिङे |
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मुद्रास्फीति की ऊंची दर उपभोक्ताओं...
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भारत में मुद्रास्फीति के प्रकरण मानस भट्टाचार्य |
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भारत में परंपरा से मुद्रास्फीति ...
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मुद्रास्फीति और अर्थव्यवस्था की स्थिति के.आर.सुदामन |
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मुद्रास्फीति ऐसी स्थिति है जिससे...
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मुद्रास्फीति : मिथक, वास्तविकता एवं नीतिगत एजेंडा
वी. षण्णमुखम देबज्योति डे |
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भारत में तेज़ी से बढ़ रही महंगाई, वैसे ...
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लोकतांत्रिक आदर्श और भारतीय अनुभव |
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लोकतांत्रिक भारत में वर्ष 1952 में चुनावी अभियानों का सिलसिला शुरू हुआ था। और उस पहले अध्याय के बाद से ही भारत की चुनाव प्रचार प्रक्रिया औपचारिक प्रचार और अनौपचारिक सामाजिक नेटवर्किंग का एक रचनात्मक संगम रही है। चूंकि सामाजिक नेटवर्किंग विशिष्ट भारतीय सरजमीं पर होती है, चुनाव प्रचार की औपचारिक विधि और उसके लहजे का उस बात से भिन्न होना स्वाभाविक है, जिसे लोकतांत्रिक चुनाव प्रचार के आदर्श के रूप में जाना जाता है। चुनाव प्रचार के भारतीय अनुभव की कहानी उन लोकतांत्रिक आदर्शों से कोसों दूर है जो लोकतंत्र के सिद्धातंकारों ने हमें सौपी थी। पहले आम चुनाव के चुनाव प्रचार के तरीक़े और आज जिस तरह से प्रचार किया जाता है, उनके बीच का अंतर स्पष्ट करने के लिये बेहतर होगा कि उस गैर कांग्रेस उम्मीदवार की सत्यकथा सुनाई जाए, जिसने पचास के दशक के प्रारंभ में संसद का चुनाव लड़ा था। उस उम्मीदवार की विशेषताएं, उसके निर्वाचन क्षेत्र और राजनीतिक आदर्शवाद का यहां उल्लेख करना समीचीन होगा। अर्द्ध-शहरी पृष्ठभूमि वाले इस उम्मीदवार ने अपनी पूरी जवानी उपनिवेश विरोधी आंदोलन में खपा दी थी, जिसके दौरान भीड़ में भाषण देने की शानदार कला और लोगों से संपर्क बनाने के और अन्य तरीक़े उसने विकसित कर लिये थे। उसे कुछ-कुछ संगठनात्मक कार्यों की भी जानकारी थी। |
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