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| पिछले कुछ दशकों में भारत एक के बाद एक आई आपदाओं से इस कदर आहत और क्षत-विक्षत हुआ है कि उसे संभलने का अवसर ही नहीं मिल सक... |
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अग्र लेख
भारतीय अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र का योगदान जी. श्रीनिवासन
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अधिकतम शासनः ई-शासन के माध्यम से जनपहुंच
रंजीत मेहता
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भारत में ई-गवर्नेंस की शुरुआत रक्षा सेवाओं, आर्थिक नियोजन, राष्ट्रीय जनगणना, चुनाव, कर संग्रह, आदि के लिए कम्प्यूटरीकरण पर जोर के साथ 1960 के दशक के अंत में
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किसानों का कल्याणः वर्तमान परिदृश्य
जे पी मिश्र
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कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का विशालतम क्षेत्र है। इस क्षेत्र ने वर्ष 2014-15 में समग्र सकल मूल्य वर्धन में
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योगः आधुनिक जीवनशैली व अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता
ईश्वर वी बासवरेड्डी
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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इलाज में चिकित्सा के प्राचीन प्रणालियों को शामिल करने की जरूरत पर जोर दिया है। डब्ल्यूएचओ ने सु
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योग साधकों का मूल्यांकन एवं प्रमाणन
रवि पी सिंह&bsp; मनीष पांडे
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योग संस्थानों के प्रमाणन की योजना उन मूलभूत नियमों में सामंजस्य बिठाने की दिशा में उठाया कदम है,
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योगः स्वस्थ व तनावमुक्त जीवन का संतुलन
ईश्वर एन आचार&bsp; राजीव रस्तोगी
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आज की व्यस्त जीवनशैली में अपने स्वास्थ्य का ख्याल रख पाना एक जटिल कार्य हो गया है लेकिन
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प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पर विश्व की नजर |
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सन् १८५७ में आरंभ हुए भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों पर तत्कालीन विश्व के बुद्धिजीवियों की निगाहें टिकी हुई थीं। दुनियाभर के पत्रकार, लेखक, चितंक, क्रांतिकारी भारत में जारी संघर्ष को लेकर टिप्पणी कर रहे थे। चीन, रूस, इटली, फ्रासं , इंग्लैंड , अमरीका जैसे सजग देशों के समाज में भारतीय क्रांतिकारियों आरै बिट्रेन की ईस्ट इंडिया कपंनी के पक्ष-विपक्ष में तीखी बहस छिड़ी हुई थी। तब के समाचारपत्र और पर्चे इस तथ्य का समथर्न करते हैं इन प्रकाशनों में जिन देशों, तथ्यों या बुद्धिजीवियों की चर्चा उपेक्षित रही है या जिन पक्षों पर टिप्पणी कम की गई है, उन पर यहां रोशनी डालने का प्रयास किया गया है। सन् १८५७ का विवाद आज डेढ़ सौ वर्षों के बाद भी यथावत है। विवाद यह है कि वह विद्रोह था या स्वतंत्रता संग्राम? तब पूरा विश्व इस प्रश्न में उलझा हुआ था। यह उलझन आज भी जारी है। प्रश्न यह भी उठा कि कौन-सा पक्ष सही है और कौन ग़लत या कौन कितना दोषी है इन प्रश्नों में तब का ब्रिटिश समाज भी बंटा हुआ था, जो आज भी भिन्न-भिन्न मत रखता है। यहां तक कि डेढ़ सौ वर्ष मनाने के अवसर पर भी भरतीय बुद्धिजीवी कुछ हद तक और ब्रिटिश बुद्धिजीवी बहुत हद तक बंटे दिखाई दिए। लेकिन तब भी ब्रिट्रेन में अनके ऐसे बुद्धिजीवी थे जो इस्ट इंडिया कपंनी और तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासकों की भारत या भारतीय विरोधी नीति और संघर्ष को कुचलने की शैली का पुरजोर विरोध कर रहे थे ब्रिट्रेन के बुद्धिजीवियों के साथ-साथ बल्गारिया जैसे देश की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सन् १८५७ से जुड़ी राकोव्स्की की टिप्पणी ऐतिहासिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है।
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झरोखा जम्मू कश्मीर का : कश्मीर में रोमांचकारी पर्यटन |
जम्मू-कश्मीर विविधताओं और बहुलताओं का घर है| फुर्सत के पल गुजारने के अनेक तरकीबें यहाँ हर आयु वर्ग के लोगों के लिए बेशुमार है| इसलिए अगर आप ऐडवेंचर टूरिस्म या स्पोर्ट अथवा रोमांचकारी पर्यटन में रूचि रखते हैं तो जम्मू-कश्मीर के हर इलाके में आपके लिए कुछ न कुछ है.
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