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इकहत्तर वर्ष पूर्व, 1937 में 67 वर्ष की आयु में गांधीजी ने सार्वभौमिक शिक्षा के पक्ष में अपनी आवाज उठाई थी। उनकी मागं के उत्तर में कहा गया कि इस पर आने वाले व्यय को वहन करना कठिन होगा। यह उत्तर उतना ही अविश्वसनीय तब भी था, जितना आज है। लेकिन गांधीजी ने अपनी बात को वहीं नहीं छोड़ी उन्हानें कमाई के साथ-साथ पदाई जारी रखने की पद्धति की रूपरेखा भी तैयार की, जो उनकी नयी तालीम की कार्ययोजना थी। स्वाधीनता आंदोलन के एक अन्य महापुरुष बाबा साहब आंबेडकर की भी राय थी कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक विकास भी आवश्यक है। भारत का संविधान अंगीकार होने के पूर्व उन्होंने कहा, राजनीतिक तौर पर हम एक व्यक्ति, एक वोट और एक मूल्य के सिद्धांत को स्वीकार करने जा रहे हैं परन्तु सामाजिक और राजनीतिक जीवन में अपने आर्थिक ढांचें के तर्क से हम एक व्यक्ति, एक मूल्य के सिद्धातं को नकारना जारी रखगें । हम कब तक इन विरोधाभासों भरा जीवन जीते रहगें ?
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