अंक: August 2008
  बिहार में बुरा हाल
  राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना के आने के बाद बिहार के ग्रामी
  नरेगा में भ्रष्टाचार : मिथक और वास्तविकता
  राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (नरेगा) २ साल पहले २०० 
  राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी कानून के दो साल
 

राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी कानून (नरेगा) ७ सितंबर, २००&#

  सामाजिक लेखापरीक्षण के माध्यम से जवाबदेही
  राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना कानून ने २ फरवरी, २००८
  वनवासियों में जागरुकता का प्रसार
  जनपद सोनभद्र में वनवासियों के विकास की मुख्य समस्या अशिक्षा
संपादकीय
 
 
ग़रीबों की जीवनरेखा  

राट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा), २००५ को लागू हुए दो वर्ष से अधिक समय बीत चुका है। जबसे यह अधिनियम लागू हुआ है, देश के निर्धनतम जिलों में लाखों लोगों के जीवन पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। निर्धारित न्यूनतम वेतन पर १०० दिनों के रोजगार की गारंटी देने वाला यह कानून, पहला ऐसा कानून है जो दरिद्र ग्रामीण परिवारों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने हेतु सरकार को विवश करता है। इस वर्ष अप्रैल से यह योजना समूचे देश में चलाई जा रही है। परंतु, जैसाकि नियंत्रक और महालेखा परीक्षक के रपट प्रारूप में उल्लिखित है, योजना का क्रियान्वयन ठीक से नहीं ...

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नरेगा के वायदे पर अमल

अलाचेनाओं के बावजदू राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून को एक अग्रणी कानून के रूप में  स्वीकार किया गया है  इसे मज़दूरी से जुड़े नियोजन कायर्क्रम के रूप में देखा जा रहा है नरेगा वास्तव में पहला ऐसा गरीबों के प्रति प्रतिबद्धता वाला ठासे कायर्क्रम है जिससे वे अपनी गरिमा पर आंच आए बिना जीविकोपार्जन की उम्मीद कर सकते हैं आरैइसकी मागं अपने एक अधिकार के रूप में कर सकते हैं इस काननू की यह महत्वपूर्ण  विशेषता है कि इसमें १०० दिनों के काम की गारंटी  की व्यवस्था है विकास के इतिहास में इससे पहले इस तरह की कोई इतनी महत्वपूर्ण पहल नहीं की गई थी। मजदूरी से सीधा मिलने वाला लाभ गरीब परिवारारों के लिये काफी महत्व का है वास्तव में राष्ट्रीय  ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम (एनआरईजीपी) इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है और इसकी क्षमता असाधारण है। एनआरइजीए (नरेगा) की अनोखी विशेषता भारत में विकासात्मक परिद्रश्य  में बदलाव का द्वार खोलने के उल्लेखनीय मौके पैदा करने में निहित है। यह खासियत इस पर अमल के दो साल के दौरान ही प्रकट होने लगी थी। पारदर्शी प्रक्रिया सहभागिता की प्रक्रिया वाले किसी सरकारी कायर्क्रम में शायद पहली बार पारदर्शिता एवं जवाबदेही संभव हो पाई है। यह सामाजिक लेखापरीक्षण (सोशल ऑडिट) का प्रत्यक्ष परिणाम है जिसके संचालन को सूचना प्राप्ति के अधिकार के तहत डालकर उसे संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है।  ...

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Last updated: Saturday, August 02, 2008